बुजुर्ग जनों से जब जगदी के विषय में हमने बातें शुरू कीं तो जगदी से जुड़े विभिन्न प्रसंग सामने आए. बताते हैं कि एक समय किन्हीं अपरिहार्य कारणों से जगदी की चोरी हो गई थी. जगदी स्नान हेतु बाड़ाहाट उत्तरकाशी गई थी. वहां से जब जगदी स्नान कर वापस लौटी तो भौंणा में यह तय हुआ कि जगदी अपनी चोरी का पता खुद लगाएगी. पंचों ने इस चोरी को जगदी के संज्ञान में डाला और जगदी सेे अपने चुराए गए सामान को वापस पाने का आह्वïान किया. उधर, जहां अंथवालगांव में कथित तौर पर यह सामान रखा गया था उस घर में पंचों के इस निर्णय की भनक लग कर हड़कम्प मच गया. बताते हैं कि इस दौर में अंथवालगांव निवासी एक ढोल बाधक तंत्र-मंत्र विद्या का ज्ञाता था, इस चोरी के इल्जाम से बचने के लिए वह परिवार इस मंत्र-तंत्र वाले के पास गया और संकट की इस घड़ी में अपनी लाज बचाने की प्रार्थना की. इस ढोल बाधक ने उक्त व्यक्ति को रक्षा का आश्वासन दिया और बात को गोपनीय रखने की सलाह दी. बताते हैं फिर जैसे ही भौंणा से जगदी की डोली तय समयानुसार अंथवालगांव की और बढ़ी जगदी पर दिवांश (अवतरण) ऊफान पर था. जैसे-जैसे जगदी अंथवालगांव की ओर बढ़ी, तब लोगों में यह उत्सुकता और भी बढ़ गई कि जगदी किस घर में चोरी का सामान रखे होने का इशारा करती है. किंतु बताते हैं जैसे ही डोली अंथवालगांव पहुंची वैसे ही वह तांत्रिक ढोलवादक जगदी के आदर के लिए डोली की अगवानी करने लगा. ढोलवादक के मंत्रों के कारण जैसे ही जगदी आगे बढ़ी, जगदी के कपड़े उतर गए. इस घटना से पंचों में सन्नाटा फैल गया और अफरातफरी के बीच जगदी की चोरी का खुलासा नहीं हो सका.फिर बताते हैं कि उस दिन के बाद यह तांत्रिक एक दिन भी अंथवालगांव नहीं टिका और यहां से हमेशा के लिए रफ्फूचक्कर हो गया. खोजबीन से पता चला कि इस वादक के वंशज चमोली जिले के नीती-माणा में हैं, जहां आज भी जगदी के अभिशाप को भुगत रहे हैं.
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मैं गोविंदलाल आर्य, जनपद टिहरी गढ़वाल उ ाराख ड का मूल निवासी एवं वर्तमान में नवी मुंबई के नवीन पनवेल का रहिवासी हंू. मेरा ज म ०१ जनवरी १९७५...
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